॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.5.15
नन्दो महामनास्तेभ्यो वासोऽलंकारगोधनम्३।
सूतमागधवन्दिभ्यो येऽन्ये विद्योपजीविनः॥ १५
nando mahāmanāstebhyo vāso'laṃkāragodhanam|
sūtamāgadhavandibhyo ye'nye vidyopajīvinaḥ|| 15
अर्थ
नन्दबाबा स्वभावसे ही परम उदार और मनस्वी थे। उन्होंने गोपोंको बहुत-से वस्त्र, आभूषण और गौएँ दीं। सूत-मागध-वंदीजनों, नृत्य, वाद्य आदि विद्याओंसे अपना जीवन-निर्वाह करनेवालों तथा दूसरे गुणीजनोंको भी नन्दबाबाने प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देकर उनका यथोचित सत्कार किया। यह सब करनेमें उनका उद्देश्य यही था कि इन कर्मोंसे भगवान् विष्णु प्रसन्न हों और मेरे इस नवजात शिशुका मंगल हो॥ १५-१६॥
टिप्पणियाँ
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धनैः।