श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता।

व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता॥ १७

rohiṇī ca mahābhāgā nandagopābhinanditā|

vyacarad divyavāsaḥsrakkaṇṭhābharaṇabhūṣitā|| 17

अर्थ

नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति-भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने-जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं॥ १७॥

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