श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।

कारयामास विधिवत्१ पितृदेवार्चनं तथा॥ २

vācayitvā svastyayanaṃ jātakarmātmajasya vai|

kārayāmāsa vidhivat pitṛdevārcanaṃ tathā|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥✎ 1400 1401 1402 2059 2235 2236

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    धिना पितृ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 151)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1400 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंदीजनण् → वंदीजन
  • #1401 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मागधञ् → मागध
  • #1402 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषण → वस्त्राभूषण
  • #2059 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2235 टिप्पणी: → वंशका वर्णन करनेवाले।
  • #2236 टिप्पणी: → समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है—‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा      वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’ 

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