परीक्षित्! नन्दबाबाने वसुदेवजीका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। वे आदरपूर्वक आरामसे बैठ गये। उस समय उनका चित्त अपने पुत्रोंमें लग रहा था। वे नन्दबाबासे कुशलमंगल पूछकर कहने लगे॥ २२॥
पूजितः सुखमासीनः पृष्ट्वानामयमादृतः।
प्रसक्तधीः स्वात्मजयोरिदमाह विशाम्पते॥ २२
परीक्षित्! नन्दबाबाने वसुदेवजीका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। वे आदरपूर्वक आरामसे बैठ गये। उस समय उनका चित्त अपने पुत्रोंमें लग रहा था। वे नन्दबाबासे कुशलमंगल पूछकर कहने लगे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.5.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 153) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/22/