श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कालेन स्नानशौचाभ्यां संस्कारैस्तपसेज्यया।

शुध्यन्ति दानैः सन्तुष्ट्या द्रव्याण्यात्माऽऽत्मविद्यया॥ ४

kālena snānaśaucābhyāṃ saṃskāraistapasejyayā|

śudhyanti dānaiḥ santuṣṭyā dravyāṇyātmā''tmavidyayā|| 4

अर्थ

(संस्कारोंसे ही गर्भशुद्धि होती है—यह प्रदर्शित करनेके लिये अनेक दृष्टान्तोंका उल्लेख करते हैं—) समयसे (नूतनजल, अशुद्ध भूमि आदि), स्नानसे (शरीर आदि), प्रक्षालनसे (वस्त्रादि), संस्कारोंसे (गर्भादि), तपस्यासे (इन्द्रियादि), यज्ञसे (ब्राह्मणादि), दानसे (धन-धान्यादि) और संतोषसे (मन आदि) द्रव्य शुद्ध होते हैं। परन्तु आत्माकी शुद्धि तो आत्मज्ञानसे ही होती है॥ ४॥✎ 1400 1401 1402 2059 2235 2236

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1400 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंदीजनण् → वंदीजन
  • #1401 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मागधञ् → मागध
  • #1402 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषण → वस्त्राभूषण
  • #2059 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2235 टिप्पणी: → वंशका वर्णन करनेवाले।
  • #2236 टिप्पणी: → समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है—‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा      वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’ 

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