श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

व्रजः सम्मृष्टसंसिक्तद्वाराजिरगृहान्तरः।

चित्रध्वजपताकास्रक्चैलपल्लवतोरणैः॥ ६

vrajaḥ sammṛṣṭasaṃsiktadvārājiragṛhāntaraḥ|

citradhvajapatākāsrakcailapallavatoraṇaiḥ|| 6

अर्थ

व्रजमण्डलके सभी घरोंके द्वार, आँगन और भीतरी भाग झाड़-बुहार दिये गये; उनमें सुगन्धित जलका छिड़काव किया गया; उन्हें चित्र-विचित्र, ध्वजा-पताका, पुष्पोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्र और पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे सजाया गया॥ ६॥✎ 1400 1401 1402 2059 2235 2236

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1400 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंदीजनण् → वंदीजन
  • #1401 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मागधञ् → मागध
  • #1402 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषण → वस्त्राभूषण
  • #2059 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2235 टिप्पणी: → वंशका वर्णन करनेवाले।
  • #2236 टिप्पणी: → समयानुसार उक्तियोंसे स्तुति करनेवाले भाट। जैसा कि कहा है—‘सूताः पौराणिकाः प्रोक्ता मागधा      वंशशंसकाः । वन्दिनस्त्वमलप्रज्ञाः प्रस्तावसदृशोक्तयः॥’ 

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