श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यानमास्थाय जह्येतद् व्यसनात् स्वान् समुद्धर।

एतदर्थं हि नौ जन्म साधूनामीश शर्मकृत्॥ १४

yānamāsthāya jahyetad vyasanāt svān samuddhara|

etadarthaṃ hi nau janma sādhūnāmīśa śarmakṛt|| 14

अर्थ

अब आप इस रथपर सवार होकर शत्रु-सेनाका संहार कीजिये और अपने स्वजनोंको इस विपत्तिसे बचाइये। भगवन्! साधुओंका कल्याण करनेके लिये ही हम दोनोंने अवतार ग्रहण किया है॥ १४॥

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