श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

त्रयोविंशत्यनीकाख्यं भूमेर्भारमपाकुरु।

एवं सम्मन्त्र्य दाशार्हौ दंशितौ रथिनौ पुरात्॥ १५✎ 2107

trayoviṃśatyanīkākhyaṃ bhūmerbhāramapākuru|

evaṃ sammantrya dāśārhau daṃśitau rathinau purāt|| 15

अर्थ

अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वीका यह विपुल भार नष्ट कीजिये।’ भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथपर सवार होकर वे मथुरासे निकले। उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। श्रीकृष्णका रथ हाँक रहा था दारुक। पुरीसे बाहर निकलकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2107 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): म्मन्त्रॺ दाशा → म्मन्त्र्य दाशा

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