श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

निर्भिन्‍नकुम्भाः करिणो निपेतु-

रनेकशोऽश्‍वा शरवृक्णकन्धराः।

रथा हताश्‍वध्वजसूतनायकाः

पदातयश्छिन्‍नभुजोरुकन्धराः ॥ २५

nirbhinnakumbhāḥ kariṇo nipetu-

ranekaśo'śvā śaravṛkṇakandharāḥ|

rathā hatāśvadhvajasūtanāyakāḥ

padātayaśchinnabhujorukandharāḥ || 25

अर्थ

इससे बहुत-से हाथियोंके सिर फट गये और वे मर-मरकर गिरने लगे। बाणोंकी बौछारसे अनेकों घोड़ोंके सिर धड़से अलग हो गये। घोड़े, ध्वजा, सारथि और रथियोंके नष्ट हो जानेसे बहुत-से रथ बेकाम हो गये। पैदल सेनाकी बाँहें, जाँघ और सिर आदि अंग-प्रत्यंग कट-कटकर गिर पड़े॥ २५॥✎ 1999 2108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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