श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

करोरुमीना नरकेशशैवला

धनुस्तरंगायुधगुल्मसंकुलाः ।

अच्छूरिकावर्तभयानका महा-

मणिप्रवेकाभरणाश्मशर्कराः ॥ २७

karorumīnā narakeśaśaivalā

dhanustaraṃgāyudhagulmasaṃkulāḥ |

acchūrikāvartabhayānakā mahā-

maṇipravekābharaṇāśmaśarkarāḥ || 27

अर्थ

उस युद्धमें अपार तेजस्वी भगवान् बलरामजीने अपने मूसलकी चोटसे बहुत-से मतवाले शत्रुओंको मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंगसे निकले हुए खूनकी सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उन नदियोंमें मनुष्योंकी भुजाएँ साँपके समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओंकी भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी द्वीप-जैसे और घोड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियोंकी तरह, मनुष्योंके केश सेवारके समान, धनुष तरंगोंकी भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकोंके समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थरके रोड़ों तथा कंकड़ोंके समान बहे जा रहे थे। उन नदियोंको देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरोंका आपसमें खूब उत्साह बढ़ रहा था॥ २६—२८॥✎ 1999 2108

यह अर्थ श्लोक 26–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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