श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

बलं तदंगार्णवदुर्गभैरवं

दुरन्तपारं मगधेन्द्रपालितम्।

क्षयं प्रणीतं वसुदेवपुत्रयो-

र्विक्रीडितं तज्जगदीशयोः परम्॥ २९

balaṃ tadaṃgārṇavadurgabhairavaṃ

durantapāraṃ magadhendrapālitam|

kṣayaṃ praṇītaṃ vasudevaputrayo-

rvikrīḍitaṃ tajjagadīśayoḥ param|| 29

अर्थ

परीक्षित्! जरासन्धकी वह सेना समुद्रके समान दुर्गम, भयावह और बड़ी कठिनाईसे जीतनेयोग्य थी। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने थोड़े ही समयमें उसे नष्ट कर डाला। वे सारे जगत‍्के स्वामी हैं। उनके लिये एक सेनाका नाश कर देना केवल खिलवाड़ ही तो है॥ २९॥✎ 1999 2108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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