श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः संकर्षणसहायवान्।

अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत्॥ ४६

taṃ dṛṣṭvācintayat kṛṣṇaḥ saṃkarṣaṇasahāyavān|

aho yadūnāṃ vṛjinaṃ prāptaṃ hyubhayato mahat|| 46

अर्थ

कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया— ‘अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन—ये दो-दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं॥ ४६॥

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