कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया— ‘अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन—ये दो-दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं॥ ४६॥
तं दृष्ट्वाचिन्तयत् कृष्णः संकर्षणसहायवान्।
अहो यदूनां वृजिनं प्राप्तं ह्युभयतो महत्॥ ४६
कालयवनकी यह असमय चढ़ाई देखकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ मिलकर विचार किया— ‘अहो! इस समय तो यदुवंशियोंपर जरासन्ध और कालयवन—ये दो-दो विपत्तियाँ एक साथ ही मँडरा रही हैं॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 450) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/46/