आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा॥ ४७॥
यवनोऽयं निरुन्धेऽस्मानद्य तावन्महाबलः।
मागधोऽप्यद्य वा श्वो वा परश्वो वाऽऽगमिष्यति॥ ४७
आज इस परम बलशाली यवनने हमें आकर घेर लिया है और जरासन्ध भी आज, कल या परसोंमें आ ही जायेगा॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.50.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 451) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/50/47/