श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

इति सम्मन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम्।✎ 2109

अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत्॥ ५०

iti sammantrya bhagavān durgaṃ dvādaśayojanam|

antaḥsamudre nagaraṃ kṛtsnādbhutamacīkarat|| 50

अर्थ

बलरामजीसे इस प्रकार सलाह करके भगवान् श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगरकी लम्बाई-चौड़ाई अड़तालीस कोसकी थी॥ ५०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2109 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): म्मन्त्रॺ भगवा → म्मन्त्र्य भगवा

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