श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दृश्यते यत्र हि त्वाष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम्।

रथ्याचत्वरवीथीभिर्यथावास्तु विनिर्मितम्॥ ५१

dṛśyate yatra hi tvāṣṭraṃ vijñānaṃ śilpanaipuṇam|

rathyācatvaravīthībhiryathāvāstu vinirmitam|| 51

अर्थ

उस नगरकी एक-एक वस्तुमें विश्‍वकर्माका विज्ञान (वास्तु-विज्ञान) और शिल्पकलाकी निपुणता प्रकट होती थी। उसमें वास्तुशास्त्रके अनुसार बड़ी-बड़ी सड़कों, चौराहों और गलियोंका यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था॥ ५१॥

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