श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तत्र योगप्रभावेण नीत्वा सर्वजनं हरिः।

प्रजापालेन रामेण कृष्णः समनुमन्त्रितः।

निर्जगाम पुरद्वारात् पद्ममाली निरायुधः॥ ५८

tatra yogaprabhāveṇa nītvā sarvajanaṃ hariḥ|

prajāpālena rāmeṇa kṛṣṇaḥ samanumantritaḥ|

nirjagāma puradvārāt padmamālī nirāyudhaḥ|| 58

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने अपने समस्त स्वजन-सम्बन्धियोंको अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके द्वारा द्वारकामें पहुँचा दिया। शेष प्रजाकी रक्षाके लिये बलरामजीको मथुरापुरीमें रख दिया और उनसे सलाह लेकर गलेमें कमलोंकी माला पहने, बिना कोई अस्त्र-शस्त्र लिये स्वयं नगरके बड़े दरवाजेसे बाहर निकल आये॥ ५८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
दुर्गनिवेशनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५०॥

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