॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.51.61
युंजानानामभक्तानां प्राणायामादिभिर्मनः।
अक्षीणवासनं राजन् दृश्यते पुनरुत्थितम्॥ ६१
yuṃjānānāmabhaktānāṃ prāṇāyāmādibhirmanaḥ|
akṣīṇavāsanaṃ rājan dṛśyate punarutthitam|| 61
अर्थ
जो लोग मेरे भक्त नहीं होते, वे चाहे प्राणायाम आदिके द्वारा अपने मनको वशमें करनेका कितना ही प्रयत्न क्यों न करें, उनकी वासनाएँ क्षीण नहीं होतीं और राजन्! उनका मन फिरसे विषयोंके लिये मचल पड़ता है॥ ६१॥