तुम अपने मन और सारे मनोभावोंको मुझे समर्पित कर दो, मुझमें लगा दो और फिर स्वच्छन्दरूपसे पृथ्वीपर विचरण करो। मुझमें तुम्हारी विषय-वासनाशून्य निर्मल भक्ति सदा बनी रहेगी॥ ६२॥
विचरस्व महीं कामं मय्यावेशितमानसः।
अस्त्वेव नित्यदा तुभ्यं भक्तिर्मय्यनपायिनी॥ ६२
तुम अपने मन और सारे मनोभावोंको मुझे समर्पित कर दो, मुझमें लगा दो और फिर स्वच्छन्दरूपसे पृथ्वीपर विचरण करो। मुझमें तुम्हारी विषय-वासनाशून्य निर्मल भक्ति सदा बनी रहेगी॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 460) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/62/