श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.62

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विचरस्व महीं कामं मय्यावेशितमानसः।

अस्त्वेव नित्यदा तुभ्यं भक्तिर्मय्यनपायिनी॥ ६२

vicarasva mahīṃ kāmaṃ mayyāveśitamānasaḥ|

astveva nityadā tubhyaṃ bhaktirmayyanapāyinī|| 62

अर्थ

तुम अपने मन और सारे मनोभावोंको मुझे समर्पित कर दो, मुझमें लगा दो और फिर स्वच्छन्दरूपसे पृथ्वीपर विचरण करो। मुझमें तुम्हारी विषय-वासनाशून्य निर्मल भक्ति सदा बनी रहेगी॥ ६२॥

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