श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

क्षात्रधर्मस्थितो जन्तून् न्यवधीर्मृगयादिभिः।

समाहितस्तत्तपसा जह्यघं मदुपाश्रितः॥ ६३

kṣātradharmasthito jantūn nyavadhīrmṛgayādibhiḥ|

samāhitastattapasā jahyaghaṃ madupāśritaḥ|| 63

अर्थ

तुमने क्षत्रियधर्मका आचरण करते समय शिकार आदिके अवसरोंपर बहुत-से पशुओंका वध किया है। अब एकाग्रचित्तसे मेरी उपासना करते हुए तपस्याके द्वारा उस पापको धो डालो॥ ६३॥

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