श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

असन्तुष्टोऽसकृल्लोकानाप्नोत्यपि सुरेश्‍वरः।

अकिंचनोऽपि संतुष्ट शेते सर्वांगविज्वरः॥ ३२

asantuṣṭo'sakṛllokānāpnotyapi sureśvaraḥ|

akiṃcano'pi saṃtuṣṭa śete sarvāṃgavijvaraḥ|| 32

अर्थ

यदि इन्द्रका पद पाकर भी किसीको सन्तोष न हो तो उसे सुखके लिये एक लोकसे दूसरे लोकमें बार-बार भटकना पड़ेगा, वह कहीं भी शान्तिसे बैठ नहीं सकेगा। परन्तु जिसके पास तनिक भी संग्रह-परिग्रह नहीं है और जो उसी अवस्थामें सन्तुष्ट है, वह सब प्रकारसे सन्तापरहित होकर सुखकी नींद सोता है॥ ३२॥✎ 890

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #890 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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