जो स्वयं प्राप्त हुई वस्तुसे सन्तोष कर लेते हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही मधुर है और जो समस्त प्राणियोंके परम हितैषी, अहंकाररहित और शान्त हैं—उन ब्राह्मणोंको मैं सदा सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ॥ ३३॥✎ 890
विप्रान् स्वलाभसंतुष्टान् साधून् भूतसुहृत्तमान्।
निरहंकारिणः शान्तान् नमस्ये शिरसासकृत्॥ ३३
जो स्वयं प्राप्त हुई वस्तुसे सन्तोष कर लेते हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही मधुर है और जो समस्त प्राणियोंके परम हितैषी, अहंकाररहित और शान्त हैं—उन ब्राह्मणोंको मैं सदा सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 464) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)