श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

चक्रुः सामर्ग्यजुर्मन्त्रैर्वध्वा रक्षां द्विजोत्तमाः।

पुरोहितोऽथर्वविद् वै जुहाव ग्रहशान्तये॥ १२

cakruḥ sāmargyajurmantrairvadhvā rakṣāṃ dvijottamāḥ|

purohito'tharvavid vai juhāva grahaśāntaye|| 12

अर्थ

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने साम, ऋक् और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे उनकी रक्षा की और अथर्ववेदके विद्वान् पुरोहितने ग्रह-शान्तिके लिये हवन किया॥ १२॥✎ 1934

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1934 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पुष्प-माला → पुष्पमाला

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