श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सैवं शनैश्‍चलयती चलपद्मकोशौ

प्राप्तिं तदा भगवतः प्रसमीक्षमाणा।

उत्सार्य वामकरजैरलकानपाङ्गैः

प्राप्तान् ह्रियैक्षत नृपान् ददृशेऽच्युतं सा॥ ५४

saivaṃ śanaiścalayatī calapadmakośau

prāptiṃ tadā bhagavataḥ prasamīkṣamāṇā|

utsārya vāmakarajairalakānapāṅgaiḥ

prāptān hriyaikṣata nṛpān dadṛśe'cyutaṃ sā|| 54

अर्थ

इस प्रकार रुक्मिणीजी भगवान् श्रीकृष्णके शुभागमनकी प्रतीक्षा करती हुई अपने कमलकी कलीके समान सुकुमार चरणोंको बहुत ही धीरे-धीरे आगे बढ़ा रही थीं। उन्होंने अपने बायें हाथकी अँगुलियोंसे मुखकी ओर लटकती हुई अलकें हटायीं और वहाँ आये हुए नरपतियोंकी ओर लजीली चितवनसे देखा। उसी समय उन्हें श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन हुए॥ ५४॥

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