श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तां राजकन्यां रथमारुरुक्षतीं

जहार कृष्णो द्विषतां समीक्षताम्।

रथं समारोप्य सुपर्णलक्षणं

राजन्यचक्रं परिभूय माधवः॥ ५५

tāṃ rājakanyāṃ rathamārurukṣatīṃ

jahāra kṛṣṇo dviṣatāṃ samīkṣatām|

rathaṃ samāropya suparṇalakṣaṇaṃ

rājanyacakraṃ paribhūya mādhavaḥ|| 55

अर्थ

राजकुमारी रुक्मिणीजी रथपर चढ़ना ही चाहती थीं कि भगवान् श्रीकृष्णने समस्त शत्रुओंके देखते-देखते उनकी भीड़मेंसे रुक्मिणीजीको उठा लिया और उन सैकड़ों राजाओंके सिरपर पाँव रखकर उन्हें अपने उस रथपर बैठा लिया, जिसकी ध्वजापर गरुड़का चिह्न लगा हुआ था॥ ५५॥

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