श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यथा दारुमयी योषिन्‍नृत्यते कुहकेच्छया।

एवमीश्‍वरतन्त्रोऽयमीहते सुखदुःखयोः॥ १२

yathā dārumayī yoṣinnṛtyate kuhakecchayā|

evamīśvaratantro'yamīhate sukhaduḥkhayoḥ|| 12

अर्थ

जैसे कठपुतली बाजीगरकी इच्छाके अनुसार नाचती है, वैसे ही यह जीव भी भगवदिच्छाके अधीन रहकर सुख और दुःखके सम्बन्धमें यथाशक्ति चेष्टा करता रहता है॥ १२॥

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