श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अहत्वा समरे कृष्णमप्रत्यूह्य च रुक्मिणीम्।

कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि वः॥ २०

ahatvā samare kṛṣṇamapratyūhya ca rukmiṇīm|

kuṇḍinaṃ na pravekṣyāmi satyametad bravīmi vaḥ|| 20

अर्थ

‘मैं आपलोगोंके बीचमें यह शपथ करता हूँ कि यदि मैं युद्धमें श्रीकृष्णको न मार सका और अपनी बहिन रुक्मिणीको न लौटा सका तो अपनी राजधानी कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा’॥ २०॥

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