श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

मैवास्मान् साध्व्यसूयेथा भ्रातुर्वैरूप्यचिन्तया।

सुखदुःखदो न चान्योऽस्ति यतः स्वकृतभुक् पुमान्॥ ३८

maivāsmān sādhvyasūyethā bhrāturvairūpyacintayā|

sukhaduḥkhado na cānyo'sti yataḥ svakṛtabhuk pumān|| 38

अर्थ

इसके बाद बलरामजीने रुक्मिणीको सम्बोधन करके कहा— ‘साध्वी! तुम्हारे भाईका रूप विकृत कर दिया गया है, यह सोचकर हमलोगोंसे बुरा न मानना; क्योंकि जीवको सुख-दुःख देनेवाला कोई दूसरा नहीं है। उसे तो अपने ही कर्मका फल भोगना पड़ता है’॥ ३८॥

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