अब श्रीकृष्णसे बोले—‘कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करनेयोग्य अपराध करे तो भी अपने ही सम्बन्धियोंके द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराधसे ही मर चुका है, मरे हुएको फिर क्या मारना?’॥ ३९॥
बन्धुर्वधार्हदोषोऽपि न बन्धोर्वधमर्हति।
त्याज्यः स्वेनैव दोषेण हतः किं हन्यते पुनः॥ ३९
अब श्रीकृष्णसे बोले—‘कृष्ण! यदि अपना सगा-सम्बन्धी वध करनेयोग्य अपराध करे तो भी अपने ही सम्बन्धियोंके द्वारा उसका मारा जाना उचित नहीं है। उसे छोड़ देना चाहिये। वह तो अपने अपराधसे ही मर चुका है, मरे हुएको फिर क्या मारना?’॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/39/