फिर रुक्मिणीजीसे बोले—‘साध्वी! ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाईको मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है’॥ ४०॥
क्षत्रियाणामयं धर्मः प्रजापतिविनिर्मितः।
भ्रातापि भ्रातरं हन्याद् येन घोरतरस्ततः॥ ४०
फिर रुक्मिणीजीसे बोले—‘साध्वी! ब्रह्माजीने क्षत्रियोंका धर्म ही ऐसा बना दिया है कि सगा भाई भी अपने भाईको मार डालता है। इसलिये यह क्षात्रधर्म अत्यन्त घोर है’॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/40/