श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कुरुसृंजयकैकेयविदर्भयदुकुन्तयः ।

मिथो मुमुदिरे तस्मिन् सम्भ्रमात् परिधावताम्॥ ५८

kurusṛṃjayakaikeyavidarbhayadukuntayaḥ |

mitho mumudire tasmin sambhramāt paridhāvatām|| 58

अर्थ

उस उत्सवमें कुतूहलवश इधर-उधर दौड़-धूप करते हुए बन्धु-वर्गोंमें कुरु, सृञ्जय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशोंके लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे॥ ५८॥✎ 892 1689

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
  • #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें

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