मेरे स्वामी! जब आप दस दिनके भी न थे, तब इस शम्बरासुरने आपको हरकर समुद्रमें डाल दिया था। वहाँ एक मच्छ आपको निगल गया और उसीके पेटसे आप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं॥ १३॥
एष त्वानिर्दशं सिन्धावक्षिपच्छम्बरोऽसुरः।
मत्स्योऽग्रसीत्तदुदरादिह प्राप्तो भवान् प्रभो॥ १३
मेरे स्वामी! जब आप दस दिनके भी न थे, तब इस शम्बरासुरने आपको हरकर समुद्रमें डाल दिया था। वहाँ एक मच्छ आपको निगल गया और उसीके पेटसे आप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 482) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/13/