श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तमिमं जहि दुर्धर्षं दुर्जयं शत्रुमात्मनः।

मायाशतविदं त्वं च मायाभिर्मोहनादिभिः॥ १४

tamimaṃ jahi durdharṣaṃ durjayaṃ śatrumātmanaḥ|

māyāśatavidaṃ tvaṃ ca māyābhirmohanādibhiḥ|| 14

अर्थ

यह शम्बरासुर सैकड़ों प्रकारकी माया जानता है। इसको अपने वशमें कर लेना या जीत लेना बहुत ही कठिन है। आप अपने इस शत्रुको मोहन आदि मायाओंके द्वारा नष्ट कर डालिये॥ १४॥

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