श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

बाध्यमानोऽस्त्रवर्षेण रौक्मिणेयो महारथः।

सत्त्वात्मिकां महाविद्यां सर्वमायोपमर्दिनीम्॥ २२

bādhyamāno'stravarṣeṇa raukmiṇeyo mahārathaḥ|

sattvātmikāṃ mahāvidyāṃ sarvamāyopamardinīm|| 22

अर्थ

महारथी प्रद्युम्‍नजीपर बहुत-सी अस्त्र-वर्षा करके जब वह उन्हें पीड़ित करने लगा तब उन्होंने समस्त मायाओंको शान्त करनेवाली सत्त्वमयी महाविद्याका प्रयोग किया॥ २२॥✎ 2113

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