श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स च मायां समाश्रित्य दैतेयीं मयदर्शिताम्।

मुमुचेऽस्त्रमयं वर्षं कार्ष्णौ वैहायसोऽसुरः॥ २१

sa ca māyāṃ samāśritya daiteyīṃ mayadarśitām|

mumuce'stramayaṃ varṣaṃ kārṣṇau vaihāyaso'suraḥ|| 21

अर्थ

तब वह दैत्य मयासुरकी बतलायी हुई आसुरी मायाका आश्रय लेकर आकाशमें चला गया और वहींसे प्रद्युम्‍नजीपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगा॥ २१॥✎ 2113

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