श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तं शम्बरः कामरूपी हृत्वा तोकमनिर्दशम्।

स विदित्वाऽऽत्मनः शत्रुं प्रास्योदन्वत्यगाद् गृहम्॥ ३

taṃ śambaraḥ kāmarūpī hṛtvā tokamanirdaśam|

sa viditvā''tmanaḥ śatruṃ prāsyodanvatyagād gṛham|| 3

अर्थ

बालक प्रद्युम्‍न अभी दस दिनके भी न हुए थे कि कामरूपी शम्बरासुर वेष बदलकर सूतिकागृहसे उन्हें हर ले गया और समुद्रमें फेंककर अपने घर लौट गया। उसे मालूम हो गया था कि यह मेरा भावी शत्रु है॥ ३॥✎ 2112

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2112 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें