श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अथ तत्रासितापांगी वैदर्भी वल्गुभाषिणी।

अस्मरत् स्वसुतं नष्टं स्नेहस्नुतपयोधरा॥ ३०

atha tatrāsitāpāṃgī vaidarbhī valgubhāṣiṇī|

asmarat svasutaṃ naṣṭaṃ snehasnutapayodharā|| 30

अर्थ

इसी समय वहाँ रुक्मिणीजी आ पहुँचीं। परीक्षित्! उनके नेत्र कजरारे और वाणी अत्यन्त मधुर थी। इस नवीन दम्पतिको देखते ही उन्हें अपने खोये हुए पुत्रकी याद हो आयी। वात्सल्यस्नेहकी अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा॥ ३०॥✎ 1690

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1690 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अन्त:-पुरकी → अन्तःपुरकी

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