इसी समय वहाँ रुक्मिणीजी आ पहुँचीं। परीक्षित्! उनके नेत्र कजरारे और वाणी अत्यन्त मधुर थी। इस नवीन दम्पतिको देखते ही उन्हें अपने खोये हुए पुत्रकी याद हो आयी। वात्सल्यस्नेहकी अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा॥ ३०॥✎ 1690
अथ तत्रासितापांगी वैदर्भी वल्गुभाषिणी।
अस्मरत् स्वसुतं नष्टं स्नेहस्नुतपयोधरा॥ ३०
इसी समय वहाँ रुक्मिणीजी आ पहुँचीं। परीक्षित्! उनके नेत्र कजरारे और वाणी अत्यन्त मधुर थी। इस नवीन दम्पतिको देखते ही उन्हें अपने खोये हुए पुत्रकी याद हो आयी। वात्सल्यस्नेहकी अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 484) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)