श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

को न्वयं नरवैदूर्यः कस्य वा कमलेक्षणः।

धृतः कया वा जठरे केयं लब्धा त्वनेन वा॥ ३१

ko nvayaṃ naravaidūryaḥ kasya vā kamalekṣaṇaḥ|

dhṛtaḥ kayā vā jaṭhare keyaṃ labdhā tvanena vā|| 31

अर्थ

रुक्मिणीजी सोचने लगीं—‘यह नररत्‍न कौन है? यह कमलनयन किसका पुत्र है? किस बड़भागिनीने इसे अपने गर्भमें धारण किया होगा? इसे यह कौन सौभाग्यवती पत्‍नी-रूपमें प्राप्त हुई है?॥ ३१॥

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