श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कंसः सहानुगोऽपीतो यद‍्द्वेषात्त्याजितः श्रिया।

जरासन्धः सप्तदश संयुगान् विरथो गतः॥ १३

kaṃsaḥ sahānugo'pīto yaddveṣāttyājitaḥ śriyā|

jarāsandhaḥ saptadaśa saṃyugān viratho gataḥ|| 13

अर्थ

तुम जानते हो कि कंस उन्हींसे द्वेष करनेके कारण राज्यलक्ष्मीको खो बैठा और अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। जरासन्ध-जैसे शूरवीरको भी उनके सामने सत्रह बार मैदानमें हारकर बिना रथके ही अपनी राजधानीमें लौट जाना पड़ा था’॥ १३॥✎ 1692

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1692 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्यमन्तक-मणि → स्यमन्तकमणि

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