॥ श्रीहरिः ॥
अहं विदेहमिच्छामि द्रष्टुं प्रियतमं मम।
इत्युक्त्वा मिथिलां राजन् विवेश यदुनन्दनः॥ २४
ahaṃ videhamicchāmi draṣṭuṃ priyatamaṃ mama|
ityuktvā mithilāṃ rājan viveśa yadunandanaḥ|| 24
अर्थ
मैं विदेहराजसे मिलना चाहता हूँ; क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं।’ परीक्षित्! यह कहकर यदुवंशशिरोमणि बलरामजी मिथिला नगरीमें चले गये॥ २४॥
अहं विदेहमिच्छामि द्रष्टुं प्रियतमं मम।
इत्युक्त्वा मिथिलां राजन् विवेश यदुनन्दनः॥ २४
मैं विदेहराजसे मिलना चाहता हूँ; क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं।’ परीक्षित्! यह कहकर यदुवंशशिरोमणि बलरामजी मिथिला नगरीमें चले गये॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.57.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 494) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/57/24/