श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय मैथिलः प्रीतमानसः।

अर्हयामास विधिवदर्हणीयं समर्हणैः॥ २५

taṃ dṛṣṭvā sahasotthāya maithilaḥ prītamānasaḥ|

arhayāmāsa vidhivadarhaṇīyaṃ samarhaṇaiḥ|| 25

अर्थ

जब मिथिलानरेशने देखा कि पूजनीय बलरामजी महाराज पधारे हैं, तब उनका हृदय आनन्दसे भर गया। उन्होंने झटपट अपने आसनसे उठकर अनेक सामग्रियोंसे उनकी पूजा की॥ २५॥

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