श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

इति वै वार्षिकान् मासान् राज्ञा सोऽभ्यर्थितः सुखम्।

जनयन् नयनानन्दमिन्द्रप्रस्थौकसां विभुः॥ १२

iti vai vārṣikān māsān rājñā so'bhyarthitaḥ sukham|

janayan nayanānandamindraprasthaukasāṃ vibhuḥ|| 12

अर्थ

राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार भगवान्‌का खूब सम्मान किया और कुछ दिन वहीं रहनेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थके नर-नारियोंको अपनी रूपमाधुरीसे नयनानन्दका दान करते हुए बरसातके चार महीनोंतक सुखपूर्वक वहीं रहे॥ १२॥

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