खाण्डव-दाहके समय अर्जुनने मय दानवको जलनेसे बचा लिया था। इसलिये उसने अर्जुनसे मित्रता करके उनके लिये एक परम अद्भुत सभा बना दी। उसी सभामें दुर्योधनको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो गया था॥ २७॥
मयश्च मोचितो वह्नेः सभां सख्य उपाहरत्।
यस्मिन् दुर्योधनस्यासीज्जलस्थलदृशिभ्रमः॥ २७
खाण्डव-दाहके समय अर्जुनने मय दानवको जलनेसे बचा लिया था। इसलिये उसने अर्जुनसे मित्रता करके उनके लिये एक परम अद्भुत सभा बना दी। उसी सभामें दुर्योधनको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो गया था॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/27/