वहाँ आकर उन्होंने विवाहके योग्य ऋतु और ज्यौतिष-शास्त्रके अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्नमें कालिन्दीजीका पाणिग्रहण किया। इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियोंको परम मंगल और परमानन्दकी प्राप्ति हुई॥ २९॥
अथोपयेमे कालिन्दीं सुपुण्यर्त्वृक्ष ऊर्जिते।
वितन्वन् परमानन्दं स्वानां परममंगलम्॥ २९
वहाँ आकर उन्होंने विवाहके योग्य ऋतु और ज्यौतिष-शास्त्रके अनुसार प्रशंसित पवित्र लग्नमें कालिन्दीजीका पाणिग्रहण किया। इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियोंको परम मंगल और परमानन्दकी प्राप्ति हुई॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/29/