कोसलनरेश महाराज नग्नजित्ने बड़ी प्रसन्नतासे उनकी अगवानी की और आसन आदि देकर बहुत बड़ी पूजा-सामग्रीसे उनका सत्कार किया। भगवान् श्रीकृष्णने भी उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया॥ ३५॥✎ 1693
स कोसलपतिः प्रीतः प्रत्युत्थानासनादिभिः।
अर्हणेनापि गुरुणा पूजयन् प्रतिनन्दितः॥ ३५
कोसलनरेश महाराज नग्नजित्ने बड़ी प्रसन्नतासे उनकी अगवानी की और आसन आदि देकर बहुत बड़ी पूजा-सामग्रीसे उनका सत्कार किया। भगवान् श्रीकृष्णने भी उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)