श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स कोसलपतिः प्रीतः प्रत्युत्थानासनादिभिः।

अर्हणेनापि गुरुणा पूजयन् प्रतिनन्दितः॥ ३५

sa kosalapatiḥ prītaḥ pratyutthānāsanādibhiḥ|

arhaṇenāpi guruṇā pūjayan pratinanditaḥ|| 35

अर्थ

कोसलनरेश महाराज न‌ग्‍नजित‍्ने बड़ी प्रसन्‍नतासे उनकी अगवानी की और आसन आदि देकर बहुत बड़ी पूजा-सामग्रीसे उनका सत्कार किया। भगवान् श्रीकृष्णने भी उनका बहुत-बहुत अभिनन्दन किया॥ ३५॥✎ 1693

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1693 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

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