राजा नग्नजित्की कन्या सत्याने देखा कि मेरे चिर-अभिलषित रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं; तब उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि ‘यदि मैंने व्रत-नियम आदिका पालन करके इन्हींका चिन्तन किया है तो ये ही मेरे पति हों और मेरी विशुद्ध लालसाको पूर्ण करें’॥ ३६॥✎ 1693
वरं विलोक्याभिमतं समागतं
नरेन्द्रकन्या चकमे रमापतिम्।
भूयादयं मे पतिराशिषोऽमलाः
करोतु सत्या यदि मे धृतो व्रतैः॥ ३६
राजा नग्नजित्की कन्या सत्याने देखा कि मेरे चिर-अभिलषित रमारमण भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं; तब उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि ‘यदि मैंने व्रत-नियम आदिका पालन करके इन्हींका चिन्तन किया है तो ये ही मेरे पति हों और मेरी विशुद्ध लालसाको पूर्ण करें’॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)