श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यत्पादपंकजरजः शिरसा बिभर्ति

श्रीरब्जजः सगिरिशः सहलोकपालैः।

लीलातनूः स्वकृतसेतुपरीप्सयेशः

काले दधत् स भगवान् मम केन तुष्येत्॥ ३७

yatpādapaṃkajarajaḥ śirasā bibharti

śrīrabjajaḥ sagiriśaḥ sahalokapālaiḥ|

līlātanūḥ svakṛtasetuparīpsayeśaḥ

kāle dadhat sa bhagavān mama kena tuṣyet|| 37

अर्थ

ना‌ग्‍नजिती सत्या मन-ही मन सोचने लगी—‘भगवती लक्ष्मी, ब्रह्मा, शंकर और बड़े-बड़े लोकपाल जिनके पदपंकजका पराग अपने सिरपर धारण करते हैं और जिन प्रभुने अपनी बनायी हुई मर्यादाका पालन करनेके लिये ही समय-समयपर अनेकों लीलावतार ग्रहण किये हैं, वे प्रभु मेरे किस धर्म, व्रत अथवा नियमसे प्रसन्‍न होंगे? वे तो केवल अपनी कृपासे ही प्रसन्‍न हो सकते हैं’॥ ३७॥✎ 1693

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1693 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विधि-पूर्वक → विधिपूर्वक

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें