॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.58.37
यत्पादपंकजरजः शिरसा बिभर्ति
श्रीरब्जजः सगिरिशः सहलोकपालैः।
लीलातनूः स्वकृतसेतुपरीप्सयेशः
काले दधत् स भगवान् मम केन तुष्येत्॥ ३७
yatpādapaṃkajarajaḥ śirasā bibharti
śrīrabjajaḥ sagiriśaḥ sahalokapālaiḥ|
līlātanūḥ svakṛtasetuparīpsayeśaḥ
kāle dadhat sa bhagavān mama kena tuṣyet|| 37
अर्थ
नाग्नजिती सत्या मन-ही मन सोचने लगी—‘भगवती लक्ष्मी, ब्रह्मा, शंकर और बड़े-बड़े लोकपाल जिनके पदपंकजका पराग अपने सिरपर धारण करते हैं और जिन प्रभुने अपनी बनायी हुई मर्यादाका पालन करनेके लिये ही समय-समयपर अनेकों लीलावतार ग्रहण किये हैं, वे प्रभु मेरे किस धर्म, व्रत अथवा नियमसे प्रसन्न होंगे? वे तो केवल अपनी कृपासे ही प्रसन्न हो सकते हैं’॥ ३७॥✎ 1693