श्रीकृष्ण! यदि इन्हें आप ही नाथ लें, अपने वशमें कर लें, तो लक्ष्मीपते! आप ही हमारी कन्याके लिये अभीष्ट वर होंगे’॥ ४४॥
यदिमे निगृहीताः स्युस्त्वयैव यदुनन्दन।
वरो भवानभिमतो दुहितुर्मे श्रियः पते॥ ४४
श्रीकृष्ण! यदि इन्हें आप ही नाथ लें, अपने वशमें कर लें, तो लक्ष्मीपते! आप ही हमारी कन्याके लिये अभीष्ट वर होंगे’॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 501) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/44/