श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एवं समयमाकर्ण्य बद‍्ध्वा परिकरं प्रभुः।

आत्मानं सप्तधा कृत्वा न्यगृह्णाल्लीलयैव तान्॥ ४५

evaṃ samayamākarṇya baddhvā parikaraṃ prabhuḥ|

ātmānaṃ saptadhā kṛtvā nyagṛhṇāllīlayaiva tān|| 45

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने राजा न‌ग्‍नजित‍्का ऐसा प्रण सुनकर कमरमें फेंट कस ली और अपने सात रूप बनाकर खेल-खेलमें ही उन बैलोंको नाथ लिया॥ ४५॥

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