श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रुत्वैतद् रुरुधुर्भूपा नयन्तं पथि कन्यकाम्।

भ‌ग्‍नवीर्याः सुदुर्मर्षा यदुभिर्गोवृषैः पुरा॥ ५३

śrutvaitad rurudhurbhūpā nayantaṃ pathi kanyakām|

bhagnavīryāḥ sudurmarṣā yadubhirgovṛṣaiḥ purā|| 53

अर्थ

परीक्षित्! यदुवंशियोंने और राजा न‌ग्‍नजित‍्के बैलोंने पहले बहुत-से राजाओंका बल-पौरुष धूलमें मिला दिया था। जब उन राजाओंने यह समाचार सुना, तब उनसे भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजय सहन न हुई। उन लोगोंने ना‌ग्‍नजिती सत्याको लेकर जाते समय मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णको घेर लिया॥ ५३॥

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