श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तमाह प्रेमवैक्लव्यरुद्धकण्ठाश्रुलोचना।

स्मरन्ती तान् बहून् क्लेशान् क्लेशापायात्मदर्शनम्॥ ८

tamāha premavaiklavyaruddhakaṇṭhāśrulocanā|

smarantī tān bahūn kleśān kleśāpāyātmadarśanam|| 8

अर्थ

उस समय प्रेमकी विह्वलतासे कुन्तीजीका गला रुँध गया था, नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे। भगवान्‌के पूछनेपर उन्हें अपने पहलेके क्लेश-पर-क्लेश याद आने लगे और वे अपनेको बहुत सँभालकर, जिनका दर्शन समस्त क्लेशोंका अन्त करनेके लिये ही हुआ करता है, उन भगवान् श्रीकृष्णसे कहने लगीं—॥ ८॥

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